नई दिल्ली | 18 फरवरी 2026: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए ‘इक्विटी रेगुलेशंस 2026’ पर मचा विवाद अब राजनीतिक रंग लेता जा रहा है। दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में छात्र विरोध प्रदर्शन और सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियमों पर रोक के बाद यह मुद्दा भाजपा के लिए सामाजिक संतुलन की बड़ी चुनौती बन गया है।
🔎 क्या है पूरा मामला?
यूजीसी ने 2026 में उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव रोकने के उद्देश्य से नए नियम अधिसूचित किए थे। इन नियमों के तहत एससी, एसटी के साथ-साथ ओबीसी वर्ग को भी सुरक्षा दायरे में शामिल किया गया।
हालांकि, 30 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर अंतरिम रोक लगा दी। अदालत ने टिप्पणी की कि ये नियम “गंभीर प्रश्न” उठाते हैं और समाज पर व्यापक प्रभाव डाल सकते हैं।
🎓 डीयू में विरोध और टकराव
13 फरवरी को डीयू के आर्ट्स फैकल्टी में छात्रों ने नियमों के पूर्ण लागू करने की मांग को लेकर प्रदर्शन किया।
- प्रदर्शन के दौरान टकराव और कथित हिंसा के आरोप लगे
- दिल्ली पुलिस ने क्रॉस-एफआईआर दर्ज की
- विश्वविद्यालय प्रशासन ने 16 मार्च तक कैंपस में सभी प्रदर्शन और धरनों पर रोक लगा दी
यह वही तारीख है जब सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर अगली सुनवाई करेगा।
🏛️ भाजपा के सामने सामाजिक संतुलन की चुनौती
करीब 12 वर्षों से केंद्र की सत्ता में रही भाजपा ने अपने पारंपरिक सवर्ण समर्थन आधार के साथ-साथ ओबीसी, एससी और एसटी समुदायों में भी अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति अपनाई है।
- चुनावों में पिछड़े वर्गों को अधिक प्रतिनिधित्व
- संवैधानिक पदों पर दलित और आदिवासी चेहरों की नियुक्ति
- अनुच्छेद 370 हटाने जैसे मुद्दों को “सामाजिक न्याय” के फ्रेम में प्रस्तुत करना
लेकिन यूजीसी नियमों पर विवाद ने “फॉरवर्ड बनाम बैकवर्ड” की बहस को फिर से हवा दे दी है। पार्टी के भीतर और संघ परिवार में यह चिंता जताई जा रही है कि कहीं सवर्ण वर्ग खुद को उपेक्षित महसूस न करने लगे।
🗣️ अलग-अलग प्रतिक्रियाएं
- एबीवीपी ने सुप्रीम कोर्ट के स्टे का स्वागत किया है और कहा कि नियमों में स्पष्टता जरूरी है।
- शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि किसी को भी नियमों का दुरुपयोग करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
- कुछ प्रखर समर्थक और बुद्धिजीवी भी इस मुद्दे पर सरकार की आलोचना कर चुके हैं।
📌 राजनीतिक पृष्ठभूमि
1990 के दशक से भाजपा का आधार मुख्य रूप से सवर्ण समुदायों में मजबूत रहा। हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी ने ओबीसी और दलित समुदायों तक पहुंच बढ़ाई।
विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद भाजपा के लिए “सामाजिक समीकरण” को संतुलित रखने की नई परीक्षा है। अगर यह मुद्दा जातीय ध्रुवीकरण की ओर बढ़ता है, तो पार्टी के व्यापक सामाजिक गठबंधन पर असर पड़ सकता है।
⚖️ आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट में 16 मार्च को सुनवाई होनी है। अदालत के फैसले से न केवल शिक्षा नीति की दिशा तय होगी, बल्कि इसके राजनीतिक प्रभाव भी दूरगामी हो सकते हैं।





